आई नोट , भाग 9
अध्याय-2
लक्ष्य और मकसद
भाग-2
★★★
अन्दर मौजूद आदमी को मारने के बाद शख्स बाहर आ गया। बाहर आने के बाद उसने अपनी खटारा कार का दरवाजा खोला और उसकी ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। ड्राइविंग सीट के स्टेरिंग पर उसने अपने दोनों हाथ रखे और घर की तरफ देखा। वहाँ खिड़की के दूसरी ओर अन्दर मरा हुआ आदमी पंँखे से लटका हुआ दिखाई दे रहा था। उसने गेयर पर हाथ डाला और उस तरफ देखना छोड़ कर कार सड़क पर चला दी।
कुछ ही देर बाद कार वापिस मेन रोड पर चल रही थी। कार चलाते हुए शख्स ने अपने मन में कहा “लक्ष्य और मकसद को पाने के पीछे कहीं ना कहीं एक वजह भी जिम्मेदार होती है। वजह लक्ष्य और मकसद को पाने के लिए मुख्य कड़ी बनती है। फिर बिना वजह के जिन्दगी में कुछ होता भी तो नहीं। अब जैसे कि इस इन्सान का मरना, क्या यह बिना वजह मरा होगा? नहीं! इसके पास अपनी वजह थी। इसकी अपनी पत्नी से लड़ाई हुई जिसके बाद यह गहरे सदमे में पहुंँच गया। यह उस गहरे सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाया और पंँखे से लटककर सुसाइड कर ली। दुनिया में वैसे भी हर दिन 400 से ज्यादा लोग सुसाइड करते हैं, ऐसे में इस आदमी का सुसाइड करना कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं।”
सामने मोड़ आया जहांँ शख्स ने कार की रफ्तार को धीमा किया और कार मोड़ते हुए वापस अपने ऑफिस की ओर ले ली। उसने अपने मन की बात को आगे जारी रखा “यह भी स्वाभाविक है कि किसी के पास इसकी मौत की वजह हो सकती है। मगर वह वजह या तो इसकी पत्नी के पास होगी, या इसके रिश्तेदारों के पास, या इसके आस पड़ोस के किसी सदस्य के पास। एक अमीर बिजनेसमैन जिसका इस व्यक्ति से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं, उसके पास भला इसे मारने की क्या वजह होगी। कोई एक अमीर बिजनेसमैन को इसके कत्ल का जिम्मेदार क्यों समझेगा, अगर समझेगा भी तो शायद वह दुनिया का सबसे बड़ा पागल ही होगा।”
30 मिनट के सफर के बाद कार वापिस ऑफिस पहुंँच चुकी थी। शख्स ने उसे पार्किंग एरिया में किया और अपनी लग्जरी कार के पास जाकर खड़ा कर दिया। इसके बाद वह कार से नीचे उतरा और तुरन्त लग्जरी कार में चला गया। वहांँ उसने 5 मिनट बिताएं। जिसके बाद बाहर आया तो वह वापस अपने पहले वाले रूप में था। अपने बिजनेस मैन वाले रुप में। उसने अपने काले रंग का कोट पेंट दोबारा पहन लिया था।
वह लिफ्ट की ओर बढ़ा और वहांँ पहुंँच कर ऊपर के किसी फ्लोर का बटन दबाया। बटन दबाने के बाद उसने अपने दोनों हाथ पेंट की जेब में डाले और अपने मन में कहा “कोई यह भी नहीं सोच सकता कि हो सकता है इस अमीर बिजनेसमैन का दिल उस आदमी की पत्नी पर आ गया हो, वह भी इस तरह से कि वह उसे हासिल करने के लिए कुछ भी कर सकता है। उसने पत्नी के सामने इस बात का प्रपोजल रखा था कि वह अपने पति को डिवोर्स दे, मगर पत्नी ने यह कहकर मना कर दिया कि उसका पति उससे बहुत प्यार करता है। इसके बाद अमीर बिजनेसमैन ने ठण्डे दिमाग से काम लिया। ऐसी योजनाएंँ बनाई जिसने पति-पत्नी की लड़ाई करवा दी। लड़ाई झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ा की यह बात पति के सुसासाइड तक आ पहुंँची। कोई ऐसा भूलकर भी नहीं सोच सकता।”
लिफ्ट का दरवाजा खुला और वह बाहर आते हुए अपने ऑफिस की तरफ जाने लगा। उसके हाथ उसकी जेब में थे। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। “लक्ष्य और मकसद, इसे हासिल करने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। जिसके पास लक्ष्य और मकसद हो उसे पता होता है उसे क्या करना है। कभी कभार इसके लिए कुछ गलत रास्तों का चयन करना पड़ता है और कभी कभार खुद कुछ गलत कर अपने लक्ष्य और मकसद को हासिल करना पड़ता है। शायद इसीलिए, इसीलिए मैं किसी कहानी के विलेन का हकदार हूँ। क्योंकि मैं कुछ भी गलत करने में संँकोच नहीं करता। वैसे दुनिया की सच्चाई तो यही है की गलती, गलती हर इन्सान करता है। खुद को अपनी नजरों में हीरो समझने वाला इन्सान भी, एक नजरिए से विलेन ही होता है।”
वह अपने ऑफिस के दरवाजे तक पहुंँच चुका था। उसने मुस्कुराहट बन्द की ओर ऑफिस का दरवाजा खोला। दरवाजे के ठीक दूसरी और उसे वही लड़की बैठी हुई दिखाई दी जो अपने पति से लड़कर घर से बाहर निकली थी। क्रॉप टॉप और स्कर्ट पहनी 28 साल की लड़की।
उसे देखते ही शख्स ऐसे बोला जैसे मानो उसे कुछ पता ही नहीं “अरे श्रेया, तुम, तुम यहांँ, तुम्हारा यहांँ आना कैसे हुआ?” वह आगे बढ़ा और धीमे-धीमे कदमों से चलता हुआ डेस्क के सामने मौजूद अपनी आलीशान कुर्सी पर जाकर बैठ गया।
श्रेया के गाल देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह इससे पहले रो रही थी, इतना कि रोने के बाद उसके आंँसू भी खत्म हो गए। उसके गाल आंँखों से निकलने वाले आंँसुओं की वजह से सावले पड़ चुके। “आशीष,” श्रेया ने अपने सामने मौजूद शख्स का नाम लिया “तुम सही थे। तुम्हारी हर एक बात सही थी। तुमने मेरे पति को लेकर जो भी कहा था वह बिल्कुल सही कहा था। उसने, उसने मुझे धोखा दिया। मेरे होते हुए भी उसके सम्बन्ध किसी और लड़की से थे। फिर धोखा तो दिया ही दिया इस बात को मानने से इन्कार भी कर दिया कि उसके सम्बन्ध किसी लड़की से थे। वो, वो उसे पहचानने तक से मना कर चुका था।”
आशीष ने एक शैतानी मुस्कुराहट दिखाई, जो इस मौके पर एक मीठी मुस्कुराहट के रूप में दिखाई दे रही थी। मुस्कुराहट दिखाते हुए उसने कहा “दुनिया के सब पति ऐसे ही होते हैं। जब सच्चाई बाहर आ जाती हैं तो वह उस सच्चाई से मुकर जाते हैं। धोखा, धोखा तो इन्सान के खून में ही होता है। कोई किसी इन्सान के चेहरे को देखकर यह भी नहीं बता सकता, कि वह धोखा दे रहा है या नहीं।”
“सही कहा तुमने। मैंने अपने पति पर सबसे बढ़कर यकीन किया था। इतना ज्यादा कि मैं उसे अपनी पूरी दुनिया मानती थी। मैंने उसके लिए सब किया। उसकी हर एक बात मानी। मगर इसके बावजूद भी उसने यह किया, मैं कभी ऐसा सोच भी नहीं सकती।” श्रेया कहते-कहते रो पड़ी।
आशीष ने यह देखा तो समझाने वाले अन्दाज में बोला “देखो अब जो हो गया सो हो। अब तुम्हें यह सोचना चाहिए कि तुम्हें आगे क्या करना है। तुम्हें एक बेहतर रिश्ते की तरफ बढ़ना होगा। अपने पति को छोड़कर एक नई जिन्दगी की शुरुआत करनी होगी।” तभी आशीष ने वहांँ मौजूद बैग की तरफ देखा जो श्रेया के पास ही पड़ा था। “क्या तुम घर छोड़ कर आई हो?” उसने बैग देखते ही पूछा।
श्रेया बैग की तरफ देखने लगी “हांँ, मैं वहांँ और ज्यादा देर तक नहीं रह सकती थी। जिसने मुझे धोखा दिया हो उस इन्सान के साथ कोई कैसे रह सकता है। इसलिए मैंने घर छोड़ना बेहतर समझा।”
“मगर तुम्हारा तो यहांँ कोई दोस्त ही नहीं है। फिर तुम शहर में किसी को जानती भी नहीं हो। तुम यहांँ शहर में किसके पास रहोगी।”
“फिलहाल मैं नहीं जानती। मुझे कुछ नहीं पता। मैंने जब अपने पति से लड़ाई कर घर छोड़ा तो मुझे सिर्फ और सिर्फ तुम्हारा ख्याल आया। हांँ मैं जानती हूंँ, मैं जानती हूंँ तुमने मुझे प्रपोज किया था और मैंने तुम्हें मना कर दिया था। मगर इसके बावजूद एक तुम ही हो जिसे मैं उम्मीद के तौर पर देख रही हूंँ। एक तुम ही हो जो शायद मेरी हालत और मेरी बात को समझ सकते हो।”
“हांँ क्यों नहीं।” आशीष अपनी कुर्सी पर आगे की तरफ झुक गया। उसने नाटकीय अन्दाज में कहा “तुम मेरे प्रपोज को एक बार नजरअन्दाज कर दो। वह पुरानी बात थी। अभी अपना समान उठाओ और मेरे घर चलो, जब तक तुम्हारा मामला ठीक नहीं हो जाता तब तक तुम मेरे घर पर रह सकती हो। जितने दिन चाहो उतने दिन। मुझे इसे लेकर ना तो किसी तरह का एतराज है और ना ही किसी तरह की आपत्ति।”
“तुम्हारे घर, मगर तुम्हारे घर बाकि के लोग क्या सोचेंगे। तुम्हारे मम्मी पापा, तुम्हारी बहन, तुम्हारी बहन तो है भी बहुत गुस्से वाली, मुझे नहीं लगता तुम्हारे घर जाना ठीक रहेगा।”
“अगर ऐसा है तो हम हमारे गेस्ट हॉउस चल सकते हैं। वहांँ कोई भी नहीं रहता। इससे घर वाली समस्या भी दूर हो जाएगी और तुम्हारी जो मुश्किलें हैं वह भी।”
श्रेया ने हांँ वाले अन्दाज में सिर हिलाया। “ठीक है। शायद यह तुम्हारे घर जाने से ज्यादा बेहतर रहेगा।”
“ठीक है चलो।” आशीष अपनी जगह से खड़ा हुआ और श्रेया के बैग की तरफ बढ़ा।
उसने बैग उठाया और श्रेया के साथ ऑफिस से बाहर निकल आया। ऑफिस से बाहर निकलने के बाद दोनों ही लिफ्ट में गए और वहांँ आशीष ने वापिस ग्राउड फ्लोर का बटन दबा दिया। उसने बैग लिफ्ट के फर्श पर रखा और अपने दोनों हाथ पेंट की जेब में डालते हुए अपने चेहरे पर खुशी दिखाई।
इस खुशी के साथ वह अपने मन में बोला “लक्ष्य और मकसद, जब हम अपने लक्ष्य और मकसद पर चलते हैं, तो हमारा रास्ता हमें अपने आप मन्जिल की ओर ले जाने लगता है। उस मन्जिल की ओर जिसे हम हर हाल में हासिल करना चाहते हैं। मन्जिल पास आते देखती है तो एक्साइटमेंट होता है, खुशी होती है, लेकिन एक बात का यहांँ ध्यान रखना जरूरी है। एक्साइटमेंट और खुशी दोनों को छुपाना पड़ता है। तब तक के लिए जब तक मन्जिल पूरी तरह से हासिल नहीं हो जाती। लक्ष्य और मकसद, जब तक यह पूरा नहीं हो जाता, तब तक हम पर क्या बीत रही है यह बात, सिर्फ और सिर्फ किसी किताब के गहरे पन्नों में ही दर्ज रहनी चाहिए।”
लिफ्ट का दरवाजा खुला और पार्किंग एरिया दिखाई दिया। आशीष ने लग्जरी कार की तरफ बढ़ते हुए ड्राइवर को फोन लगाया और उसे बुलाया। लग्जरी कार तक पहुंँचते-पहुंँचते ड्राइवर भी कार के पास आ गया। उसने सलाम अदा किया और कार के पीछे वाला दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खोलते ही आशीष ने श्रेया को अन्दर बैठने के लिए कहा। श्रेया के अन्दर बैठने के बाद उसने बैग सामने वाली सीट पर रखा और खुद भी श्रेया के पास जाकर बैठ गया। बैठने के बाद उसने कार को गेस्ट हॉउस की तरफ ले जाने के लिए कह दिया।
जल्द ही गाड़ी बिल्डिंग से बाहर निकलते हुए गेस्ट हॉउस की तरफ चल पड़ी थी। आशीष ने श्रेया की तरफ देखा, उसके मोटे गाल और होंठ, कार की हल्की लाल रंग की रोशनी में आकर्षित लग रहे थे।
आशीष ने उसे देखना छोड़ा और सामने सड़क की तरफ देखते हुए मन में कहा “ लक्ष्य और मकसद को पाने की जर्नी एक्साइटमेंट से भरी होती है। एक ऐसी जर्नी जो किसी कहानी के एक अध्याय को दिखाती है। यह जिन्दगी कहानी ही तो है। और इस कहानी के भी अपने अलग मजे हैं। किसी बात के एक हिस्से को छुपा दिया जाए, उस पर पर्दा गिरा कर उसे राज बना दिया जाए, तो जो चीज और एक्साइटमेंट हासिल होता है उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। आम दुनिया में जो कहानी को अनुभव करते हैं, यानी कि पाठक, वो इसे सस्पेंस कहते हैं, मगर मैं इसे सिर्फ और सिर्फ कोई एक छुपी हुई चीज कहूंँगा। एक ऐसी छुपी हुई चीज जो आपके लक्ष्य और मकसद को हासिल करने में आपकी मदद करती है। क्योंकि जब यह छुपी हुई चीज बाहर आती है तो आपका लक्ष्य और मकसद, उसके मायने खत्म हो जाते हैं। ठीक वैसे जैसे सस्पेंस के बाहर आ जाने के पर कहानी, कहानी के कोई मायने नहीं रहते। सब...सब बस यही तो है।”
★★★
Seema Priyadarshini sahay
05-Dec-2021 02:05 AM
बहुत अच्छी कहानी
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